राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड के सचिव को हटाने की सीटू ने उठायी मांग सरकार की अनुमति के बिना ही ले लिया मनरेगा मज़दूरों के लाभ रोकने का फ़ैसला

विवेकानंद वशिष्ठ/हमीरपुर :- हिमाचल भवन एवं सड़क निर्माण मज़दूर यूनियन ने 12 दिसंबर को राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड के सचिव द्धारा मनरेगा मज़दूरों के आवेदन पत्र लेने और उन्हें मिलने वाले लाभ रोकने सबंधी पत्र को उक्त अधिकारी की मनमर्ज़ी और अनुशासन हीनता वाला फैसला बताया है और मुख्यमंत्री से इस अधिकारी को तुरंत पद से हटाने की मांग की है। जोगिंदर कुमार हिमाचल भवन एवम् सड़क निर्माण मजदूर यूनियन के राज्य अध्यक्ष व श्रमिक कल्याण बोर्ड के सदस्य ने बताया कि वर्ष 2013 में यूपीए-2 सरकार ने मनरेगा मज़दूरों को राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड का सदस्य बनाने का फ़ैसला किया था। लेक़िन 2017 में केंद्र की मोदी सरकार ने मनरेगा मज़दूरों को इससे बाहर रखने सबंधी एक पत्र राज्य सरकारों को भेजा था लेकिन हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकार ने इसपर कोई कार्यवाई नहीं कि बल्कि इस दौरान मनरेगा मज़दूरों को बोर्ड से सभी लाभ मिलते रहे। लेक़िन इस बर्ष 12 सितंबर को बोर्ड के सचिव ने केंद्र सरकार के स्मरण पत्र के संदर्भ में फ़िर से राज्य सरकार के श्रम विभाग को एक पत्र लिखा था जिसमें इस बारे दोबारा क्लेरिफिकेशन मांगी थी जो पिछली सरकार ने लंबित रखी थी। हालांकि इस मुद्दे को गुपचुप तरीके से दस घण्टे के नोटिस पर 24 सितंबर को मंडी में बुलाई गई बोर्ड की मीटिंग में एजेंडा बनाया गया था जिसकी अध्यक्षता श्रम मंत्री ने की थी। लेकिन सीटू से सबंधित हिमाचल भवन एवम् सड़क निर्माण यूनियन के राज्य अध्यक्ष जो बोर्ड के सदस्य भी हैं उनके विरोध के कारण मंत्री ने इसे स्थगित करने के निर्देश दिये थे। बाबजूद इसके बोर्ड के सचिव ने मौखिक तौर पर मनरेगा मज़दूरों के प्रपत्रों की छंटाई करवा दी थी और उनके लाभ भी रोक दिए थे। जिसके ख़िलाफ़ सीटू से सबंधित यूनियन ने प्रदेश भर में खण्ड स्तर पर सितंबर माह में प्रदर्शन किए थे और 6 अक्टूबर को हमीरपुर में एक विशाल रैली निकाल कर सरकार को माँगपत्र भेजे थे। लेकिन उस समय उक्त सचिव ने कोई आदेश जारी नहीं किये थे और जिलों में आवेदन स्वीकार किये जा रहे थे और उसके बाद विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लागू हो गई जिस कारण ये मामला अभी तक लंबित था।लेकिन बड़ी हैरानी की बात तब हुई जब चुनावों में भाजपा की हार हो गई और राज्य में नई सरकार बनी जिसका शपथ ग्रहण समारोह 10 दिसंबर को शिमला में हुआ और मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री ने 12 दिसंबर को कार्यभार ग्रहण किया और उन्होंने भाजपा सरकार द्धारा अप्रैल माह के बाद लिए गए सभी निर्णयों की समीक्षा करने का फ़ैसला लिया। लेक़िन उसी दिन श्रमिक कल्याण बोर्ड के सचिव ने बिना सरकार की अनुमति के सभी श्रम अधिकारीयों को आदेश जारी कर दिए कि मनरेगा मज़दूरों के आवेदन प्रपत्र न लेने और बोर्ड के कर्मचारियों को उनके लाभ रोकने के लिए भी निर्देश जारी कर दिए।यही नहीं उन्होंने ये पत्र भाजपा नेताओं को भी उपलब्ध करवाया जिन्होंने इसे सोशल मीडिया पर पूरे प्रदेश में जारी कर दिया और इसे मुख्यमंत्री का मनरेगा मज़दूरों के लिए पहला तोहफ़ा बताया। इससे ये साबित हो गया कि बोर्ड के सचिव ने जो मामला पूर्व भाजपा सरकार के समक्ष पेश किया था उसे नई सरकार की गठन प्रक्रिया और बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त होने से पहले ही किस हैसियत से जारी किया ये सब इस अधिकारी भी मनमर्ज़ी और मुख्यमंत्री के आदेशों की उलंगन्ना का काम है और ये सब नई सरकार की छवि खराब करने के उद्देश्य से किया गया है। जोगिंदर कुमार ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि बोर्ड के सचिव के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाई की जाए और उन्हें तुरंत बर्खास्त किया जाये।उन्होंने नई सरकार से ये भी मांग की है कि मनरेगा मज़दूरों को पहले की भांति बोर्ड का सदस्य बनने का प्रावधान जारी रखा जाए और लंबित लाभ जल्दी जारी किए जाएं जो भाजपा सरकार ने अगस्त माह के बाद बिना किसी नोटिफिकेशन के रोके हुए हैं। जोगिंदर कुमार ये भी मांग की है कि बोर्ड ने पिछले छह महीने से किस आधार पर मजदूरों के लाभ रोके थे उसकी भी जांच कराई जाये।
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